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राधेय राधेय

आज का भगवद चिन्तन,
२ /०६ /२०१५

यदि इंसान अपने देखने के भीतरी दृष्टिकोण को बदल ले तो बाहर सब कुछ अच्छा और सुन्दर नजर आएगा। जैसा हम स्वयं होते हैं बैसा ही हमें सर्वत्र नजर आने लगता है। सीधी सी बात है जैसा आँखों पर चश्मा लगा होगा बैसा ही नजर आने लगेगा।

संसार में बहुत लोगों को केवल बुराईयाँ, दोष, गंदगी और गलत चीजें ही नजर आती है। यह सब उनकी कट्टर धारणा के कारण होता है, स्वयं श्री कृष्ण भी सामने आकर प्रकट हो जाएँ तो उनमें भी सबसे पहले इन्हें दोष ही नजर आएगा।
संसार में अच्छे, सज्जन, सत्कर्मी और श्रेष्ठ लोग भी बहुत हैं। धरती पर कई लोग तो ईस्वर चिन्तन करते-करते तीर्थ जैसे ही हो गए हैं। दोष दर्शन की जगह हम सबमें गुण दर्शन करने लग जाएँ तो हमारा स्वयं का विकास तो होगा ही दुनिया भी बड़ी खूबसूरत नजर आने लगेगी।

|| श्री निकुंज नायक श्रीजी आपके सभी मंगलमनोरथ पूर्ण करे ||

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व्रज - कार्तिक शुक्ल एकादशी

गुजराती – कारतक सुद अगियारस

Sunday, 22 November 2015

देव प्रबोधिनी एकादशी (देव-दिवाली)

विशेष – देवशयनी एकादशी के चार माह पश्चात आज देव प्रबोधिनी एकादशी है. आज से शीतकालीन सेवा प्रारंभ होगी.
आज से शीतकाल की सेवा प्रारंभ हो जाती है. आज से डोलोत्सव तक प्रतिदिन प्रभु को सामान्य वस्त्रों के भीतर आत्मसुख का वागा धराया जाता है.
आज से ही प्रभु के श्रीचरणों में मोजाजी धराने प्रारंभ हो जाते हैं इसी प्रकार राजभोग सरे पश्चात उत्थापन तक प्रभु सुखार्थ सम्मुख में निज मंदिर की धरती पर लाल रंग की रुईवाली पतली रजाई बिछाई जाती है. इसे ‘तेह’ कहा जाता है.
एक अंगीठी (सिगड़ी) निज मंदिर में प्रभु के सम्मुख मंगला से राजभोग तक व उत्थापन से शयन तक रखी जाती है.
और भी कई भोग आदि क्रम में परिवर्तन आज से होता है जिसका वर्णन आगे सेवाक्रम में है.

सेवाक्रम - पर्व होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी व सफ़ेद खड़ी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.
शीत प्रारंभ हो गयी है अतः आज से डोलोत्सव तक मंगला में श्रीजी को प्रतिदिन दूधघर में सिद्ध बादाम का सीरा (हलवा) का डबरा अरोगाया जाता है.
प्रभु को मंगला पश्चात चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है.
नियम के सुनहरी ज़री के चाकदार वागा व श्रीमस्तक पर ज़री की कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चंद्रिका की जोड़ धरायी जाती है.
उत्सव होने के कारण आज प्रभु को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में मेवाबाटी और दूधघर में सिद्ध केशरयुक्त बासोंदी की हांडी का अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में पांचभात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात और वड़ी-भात) आरोगाये जाते हैं.
उत्थापन समय फलफूल के साथ अरोगाये जाने वाले फीका के स्थान पर घी में तला हुआ चालनी का सूखा मेवा अरोगाया जाता है.
आज से डोलोत्सव तक प्रतिदिन संध्या-आरती समय श्रीजी को रतालू की नींबू, नमक व काली मिर्च युक्त चटनी व पिण्डखजूर (बीज निकाल कर उसके स्थान पर घी भरकर) की डबरिया अरोगायी जाती है.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)
सुभग श्रृंगार निरख मोहन को ले दर्पण कर पियहि दिखावे l
आपुन नेक निहारिये बलजाऊ आजकी छबि कछु कहत न आवे ll 1 ll
भूषण वसन रहे फवि ठांई ठांई अंग अंग छबि चितहि चुरावे l
रोमरोम प्रफुल्लित व्रज सुंदरी फूलन रूचि रूचि माल बनावे ll 2 ll
अंचलवार करत न्यौछावर तनमन अति अभिलाष बढ़ावे l
‘चतुर्भुज’प्रभु गिरिधरको स्वरुप सुधा पीवतनयन पुट तृप्ति न पावे ll 3 ll

साज – श्रीजी में आज श्याम रंग के आधार वस्त्र पर सुरमा–सितारा के सुन्दर भारी ज़रदोज़ी के काम (Work) वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी के ऊपर लाल रंग की, तकिया के ऊपर श्याम रंग की ज़री के कामवाली एवं चरणचौकी के ऊपर हरे रंग की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज सुनहरी ज़री का सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से ही सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. चरणारविन्द में लाल रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.
श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा – हीरा, मोती, माणक, पन्ना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सुनहरी ज़री की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ तथा बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं. उत्सव की मोती की चोटी (शिखा) बायीं ओर धरायी जाती है. स्वर्ण का जड़ाव का चौखटा पीठिका पर धराया जाता है. श्वेत पुष्पों की लाल एवं हरे पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में कमलछड़ी, सोने के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
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देव-प्रबोधिनी मंडप (देखें चित्र-2)
आज के दिन श्रीजी में देवोत्थापन शुभ मुहूर्त के अनुसार प्रातः मंगला पश्चात अथवा सायंकाल उत्थापन पश्चात किया जाता है.
इस वर्ष यह सायंकाल होगा अतः आज उत्थापन दर्शन वैष्णवों के लिए बाहर नहीं खोले जायेंगे क्योंकि डोलतिबारी में देवोत्थापन का मंडप बनाया जा रहा होगा. यदि शुभ मुहूर्त प्रातःकाल का हो तो मंगला दर्शन भीतर होते हैं.
डोलतिबारी के प्रथम भाग में सफेद खड़ी से मंडप बनाया जाता है एवं इसमें अनेक सुन्दर रंग भरे जाते हैं.
मंडप मांडने की सेवा श्री तिलकायत परिवार के बहूजी, बेटीजी (यदि उपस्थित हों) एवं भीतर के सेवकों के परिवार की महिलाऐं करती हैं.
पहले सफेद खड़ी से सीमांकन किया जाता है एवं उनमें विविध सुन्दर रंग भरे जाते हैं. मंडप की चारों दिशाओं में चार आयुध (शंख, चक्र, गदा एवं पद्म) एवं चारों ओर पुष्प लताएँ, तोरण आदि बनाए जाते हैं. मंडप के मध्य एक चौक (પાટલી) एवं इसके चारों ओर आठ चौक (પાટલી) बनाये जाते हैं.
यह नौ चौक का मंडप चार रेखाओं से चित्रित किया जाता है. इसके पश्चात सभी नौ चौकों में स्वास्तिक बनाये जाते हैं.
इस सुन्दर सुसज्जित मंडप के ऊपर सोलह हरे पत्ते वाले बड़े गन्नों के 4 स्तंभों से मंडप बनाया जाता है अर्थात इस मंडप को बनाने में कुल चौंसठ बड़े गन्नों का उपयोग किया जाता है. चार-चार बड़े गन्नों को इकठ्ठा कर तीन जगहों से लाल डोरी बाँध ऐसे चार गट्ठरों से एक स्तम्भ बनता है.
इन चारों स्तंभों को डोलतिबारी में इस प्रकार आपस में बाँधा जाता है कि उनके मध्य से प्रभु के दर्शन हों. मंडप की चारों ओर आठ दीप (प्रत्येक कौने में एक-एक व चार दीपक पीछे) प्रज्जवलित किये जाते हैं.
इस उपरांत कई दीपकों दीपमाला बनाई जाती है.
मंडप के चारों ओर बांस की चार टोकरियों में गन्ने के टुकड़े, शकरकंद, बेर, सिंघाड़ा, बैंगन, भाजी आदि भरकर रखे जाते हैं.
तत्पश्चात झालर, घंटा व शंखनाद के साथ श्री बालकृष्णलालजी (श्रीजी के संग विराजित स्वरुप) चरणचौकी की गादी पर विराजित किये जाते हैं.

तीन बार निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण कर देवोत्थापन की विधि की जाती है.
ऊतिष्ठोष्ठ गोविन्द त्याज निन्द्राम जगत्पते l
त्वय्युत्थिते जगन्नाथ ह्युत्थितं भुवन त्रयम् ll 1 ll
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम l
ऊत्थिते चेष्टते सर्वमुतिष्ठोतिष्ठ माधव ll 2 ll

इसके पश्चात श्री बालकृष्णलालजी को तिलक कर, संकल्प कर और तुलसी समर्पित कर दूध, दही, मिश्री के बूरे, शहद, एवं घी से पहले पंचामृत स्नान कराया जाता है एवं तब शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है.
तत्पश्चात चन्दन, आवंला, एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है एवं दग्गल धरायी जाती है.
प्रभु के सम्मुख आज से अंगीठी (सिगड़ी) रखी जाती है.
इसके पश्चात उत्सव भोग धरे जाते हैं. उत्सव भोग में प्रभु को छुट्टी बूंदी, खस्ता शक्करपारा, दूधघर में सिद्ध मावे के पेड़ा-बरफी, दूधपूड़ी, बासोंदी, जीरा मिश्रित दही, घी में तला हुआ बीज-चालनी का सूखा मेवा, विविध प्रकार के संदाना (आचार) के बटेरा, विविध प्रकार के फलफूल आदि अरोगाये जाते हैं.
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श्रीजी के अलावा अन्य सभी निधि स्वरूपों एवं हवेलियों में आज शयन पश्चात अनोसर नहीं होते, रात्रि जागरण होता है एवं द्वादशी का राजभोग तक का सेवाक्रम लगभग पांच बजे तक पूर्ण कर लिया जाता है.
कई मंदिरों में चार जागरण भोग भी रखे जाते हैं परन्तु श्रीजी मंदिर में गौलोक लीला होने से जागरण भी नहीं होता व चार भोग नहीं रखे जाते.
मैंने पूर्व में भी बताया था कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को तुलसी के बीज बोये जाते हैं एवं उनकी अभिवृद्धि और रक्षा हेतु प्रयत्न किये जाते हैं. कन्यावत उनका पालन कर आज कार्तिक शुक्ल एकादशी को उनका विवाह प्रभु के साथ किया जाता है. तुलसी पूजन एवं तुलसी विवाह का महत्व पुराणों में कई स्थानों पर बताया गया है.
आज देवोत्थापन मंडप की भांति ही तुलसी विवाह का मंडप भी मांडा जाता है. तुलसी महारानी का भी गन्ने का मंडप बनाया जाता है एवं पूजन किया जाता है. प्रभु को तुलसी अत्यंत प्रिय होने के कारण विष्णु समान उनका पूजन किया जाता है. ‘धन धन माता तुलसी’ कीर्तन गाया जाता है. परन्तु यह पूजन श्रीजी के सम्मुख नहीं होता.

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!! जय श्री कृष्णा !!

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